Tuesday, April 10, 2012

ठूंठ सा आदमी



कंक्रीट के जंगल में
संवेदना के पत्तों से विहीन
अपनी जड़ों से उखड़ा हुआ 
अपनी अकड़ में अकड़ा हुआ है
ठूंठ सा आदमी.
धूल भरी हवा और
 प्रदूषित जल से सिंचित
नोटों की खाद को तरसता 
नोटों से ही औरों को परखता 
अपने ही घर में अजनबी सा रहता
खुद से ही बेजार है ठूंठ सा आदमी. 

4 comments:

  1. मेरी यह कविता कादम्बिनी के अक्टूबर 2005 के अंक में प्रकाशित हुई थी

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  2. बहुत अच्छा लिखती हैं आप ...अच्छा मतलब सीधा सटीक और सुन्दर .....छु लेती हैं आपकी लेखनी..

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  3. धन्यवाद कंचन जी ....यहाँ लेखनी नहीं की बोर्ड ......

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